पछतावो अण छेडे रो

बारंग देसर ग्रामीण पाठशाला रे दफ्तर में कुर्सी पर विराजमान गोमन्दराम जी शाला रो काम सावळ चलावण खातर ध्यान मगन बैठा हा।


एक टाबर कक्षा सुं ऊंतावळों होय परों आयो और बोल्यों – सा परमाराम मने किशनाराम केर बत्तळावै, जद कि म्हारों नांव किशनसिंग है।

हेडमास्टर जी मौके री हालात समझग्या और बोल्या – नांव तो चैखो है, फेर भी म्हारे खने भेज, समझा देसां।

परमाराम रे दफतर मे आंवते ही हेडमास्टरजी जोर सुं बोळया – तूं कुचकेरनी करतो रे कोनी कईं।

परमाराम बोल्यो – आप चिंत्या क्यों करा,े म्हे आपे ही सलट लेस्यां। सा मेह तो तो मिन्ट में नराज ओर सेकन्ड में राजी।


आधी छुट्टी री घंटी बाजी। दोनु भायला बायर आया। परमाराम – किशनसिंह आपां री आपस री बात खातर क्यों गयो ? आंरे किसी चिंत्या कम है कांइ ? संत तुलसीदास, सूरदास नामी संत हुया है।

जोधो जी, बीको जी, शिवाजी, पृथ्वीराज जी और महाराणा प्रताप रे नाम साथे सिंग है ही कोनी। महाराणी लिछमी बाई रे नांव लारे सिंगणी कोनी।

“ अपां दोनु तो कब्बड़ी रां छटवा खिलाडी हां और जिले में छंट परार जयपर खेलण गया हा। इतो बेगो ही भुलग्यो कांई।”


किशनसिंह पिघळग्या,“ परमला तूं पढ़ाई में जितो हुषियार है बितोे ई तर्क बाज है। भाईडा तंू तो वकील बणजासी, म्है तो अठे ही टरड़यां चरावता रहसां।

परमाराम “ न भाई तूं जासी फौज में वीरचकर लेपरो’र घरे आसी। किशनसिंह – “छोड़ लारली बात ने। परसुं म्हारें खेत निदाण करने तो हाल। बाजरी री रोटी माथे धपाऊरो घी घाल’र जीमाऊंला।”

परमाराम – “ किशनसिंग थे दियाळी संु पेली खळो काढ़लो तो थारों ऊंट गाडो म्हाने दिया। किशनसिंह -“ ले जाये भलेई। पक्की बात।’’
दोनूं ताळी मिळा परा’र घरे गया परा।

आये दिन मास्टरां रो एक ही ओळभो रहवंतो “ सा किशन न तो सावळ पढ़े, सामने बोले और इत्यांमां में ईने बीने झांक परो’र नकल्यां करे।

हेडमास्टर जी “ पढ़णे में सावळ कावळ कंई” हुशियार डाक्टर इंजिनियर, या बड़ा अफसर बण जावे। नांव बाचणो लिखणो आवे जिका, डाकिया, फौजी, पुलिसमेन इसी तरह कंई न कंई बण जावे। अपां कई ने बनणे सुं क्यों रोंका। सावळ ध्यान सूं पढ़ावो और केने ही फेल ना करो ”।

”रेई बात सामने बोलण री, तो, हूं थांरे बाप रे साईनों हूं, मोड़े बेगे री छूट दे राखी हैं, फेर भी थे सामी बोलो होनी।
किशन थांने चलते ट्रक ने रोक परोर घर बेगा पोंचण खातर चढ़ावे है नी। भूलो ना”।

चार साल बाद हेडमास्टर जी उप जिला शिक्षा अधिकारी बणग्या। परमाराम एस.टी.सी. कर परा’र मास्टर बणग्या।
किशनसिंह दसवीं में फेल हुयग्या। फौज में भरती सारू गांव रे बस स्टेण्ड आया। परमाराम आपरे बचपन रे बेली नेेे बिदाई देवण सारू बस स्टेण्ड आया। हाथ हिला’परा दोनंू बिदाई ली। बस रे ठीक लारली सीट पर हेडमास्टर जी बैठ्या हा, पण किशनसिंह सुं चै निजर हुया कोनी।

बस खासी आगे निकळगी। टिकट लेवण सारू किशन जेब में हाथ घाल्यों, पर हाथ आर पर निकळ ग्यों। कंडक्टर साब टिकट देवण सारू किशनसिंह रे खने आया। किशनसिंह घबराग्या। कंडक्टर समझग्यो।

लारे बैठा हेडमास्टर जी हालात भांप परार आंगळी रे इशारे सुं कंडक्टर ने बुला’र 50 रू दिया ओर केयो बचे जिका लड़के ने दे दिया।

हेडमास्टर जी पाव किलोमीटर पेली ही उतरग्याद्व कारण कि सांवतसर पाठशाला री जांच अचाचूक कर सके।

बस पाठशाला खने ठहरी चढण वाळा चढग्या, उतरण वाळा उतरग्या। बस स्टार्ट हुयगी।

किशनसिंह कंडक्टर ने पूछयों म्हारां ए पइसा केण दिया। ठीक बेई टेम हेडमास्टर जी पाठशाला खने पहुॅंच ग्या। कंडक्टर किशन रो कांधों पींच परेर आंगळी रो इशारो कर परेर बतायो कि बे स्कूल में जावे जिकां दिया। किशन ने बहुत पछतावो हुयो कि हेडमास्टर जी री आसीस लेइजीकोनी।

भायाजोग बटवो परमाराम रे हाथ लाग ग्यो। हाथो हाथ चालते ट्रक ने रोक परा’र, बस रो लारो पकड़ बटवो किशनसिंह ने थमा दियो। दोनू भायला गदगद हुयग्या।

परमाराम हाथो हाथ गांव खानी आवते ट्रक में बैठ परार गांव उतर ग्या । घर जावते टेम रस्ते में किशनसिंह रा दादोजी टकरग्या।

दादोजी – “परमा भींवजी केवतां कि किशनो बटवो पटकग्यो।

परमाराम – “दादोसा, हाथो हाथ अबार दे परोर ही आयो हुं।

दोदासा – जींवतो रे बेटा, गाडो चाहीजे तो फेर ले लीये।

किशनसिंह फौज में चुनीजग्या रिक्यूटरी ट्रेनींग पूरी करली चैखे निशाणा बाजां में गिणती हुवण लागगी।

1972 रो भारत पाक युद्ध चालू होयग्यों। युद्ध री समाप्ती रे बाद वीरतापूर्ण कार्य रे कारण किशनसिंह वीर चकर संु सम्मानीत होया। अखबारां में खबर छपी। सेवानिवृत हेड मास्टरजी मोकळा राजी हुया।

हेडमास्टर जी बधाई रो तार भेज्यो।

किशनसिंह छुट्टी पर गांव आया। छुट्टी पूरी कर परार जिके दिन जावण लाग्या घरवाला तार दिखायो कारण कि बे मेल परार भूलग्या। किशन एक बार फेर पिछताया। किशनसिंह धीरे धीरे सुबेदार मेजर बण्ग्या सेवा निवृत हुय परार घरे आयग्या।

एक दिन सोच्यो चालो आज हेड मास्टरजी सू मिलयावां। पूछता पूछता हेडमास्टर जी रे घरे पहुंचग्या। हेडमास्टरजी रे फोटू पर टंगोडी फूल माळा ने देख परार रोवण ढूकग्या। रूंधोडे कंठ सूं बोल्या ओ पिछतावणो उमर भर रहसी।

लेखक
भंवरलाल तंवर
सेवा निवृत प्रधानाध्यापक

 

 

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