सपने निरस्त

सपने_निरस्त:
एक सामान्य वर्ष में एक सामान्य आदमी और कुछ कमाये ना कमाये अपने हक के, अपनी मेहनत के ३,००,००० तो कमा ही लेता है.. तमाम मुश्किलों के बावजूद यह उसे थोड़ी राहत देता है.. उसी समानानंतर क्रम में एक विद्यार्थी या यूं कहूं एक बेरोजगार जो सब कुछ यहां तक कि अपना भविष्य ताक पर रख पूरा साल किताबों में नजरें गड़ाएं.. अपने कलम को उम्मीदों की स्याही से भरता रहता है.. और अपने परिवार की उम्मीदों को उस कलम की महीन नोंक पर उठाये चलता है.. मध्यम वर्ग परिवार का होकर भी सब कर लेता है वह बस कुछ सपनों के एेवज में.. जो किसी और की आंखों ने देखे थे उसके लिए.. वो ३ लाख तो उसने यूं छोड़ दिये अपने सपनों के लिए जैसे उनका कोई मोल ही ना हो.. और इन सबके बाद अपना सबकुछ देकर भी सिर्फ और सिर्फ लचर व्यवस्था के कारण अपने ‘सपने निरस्त’ होते हुए देखता है वह.. पूरे घर की दीवारों तक को लिख लिख के भर दिया उसने पर रोल नम्बर से भरी शीट में अपना नम्बर नहीं पाकर जो टीस उठती है उसके मन में उसके लिए कोई शब्द नहीं है मेरे पास.. हाल ही में राजस्थान सरकार में जिस तरह से प्रतियोगी परीक्षाओं का परिणाम सामने आया है और कुछ परीक्षाओं का निरस्तीकरण हुआ है.. उसके साथ ही अनन्त ‘सपने भी निरस्त’ हुए हैं.. जिनकी भरपाई किसी भी सरकार के बस में नहीं है।।


#Subh

Facebook Comments

Leave a Comment